जयपुर न्यूज डेस्क: जयपुर की एक फैमिली कोर्ट ने हाल ही में एक अहम फैसला सुनाते हुए एक दंपति को तलाक की मंजूरी दे दी है। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि पत्नी द्वारा सोशल मीडिया पर की गई आपत्तिजनक गतिविधियां 'मानसिक क्रूरता' की श्रेणी में आती हैं। पति के वकील डीएस शेखावत ने 17 अप्रैल के इस आदेश के बारे में जानकारी देते हुए बताया कि यह फैसला स्पष्ट करता है कि वैवाहिक विवादों में सोशल मीडिया का आचरण और ऑनलाइन व्यवहार एक महत्वपूर्ण साक्ष्य हो सकता है, विशेषकर तब जब यह किसी जीवनसाथी के लिए अपमान या भावनात्मक आघात का कारण बनता है।
यह मामला 2015 में हिंदू रीति-रिवाजों से हुई शादी से जुड़ा है। पति ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13 के तहत तलाक के लिए याचिका दायर की थी। पति का आरोप था कि शादी के कुछ समय बाद से ही उनके बीच विवाद शुरू हो गए थे। पति ने अपनी शिकायत में पत्नी पर गाली-गलौज करने, दुर्व्यवहार करने और अपने माता-पिता से अलग होने का दबाव बनाने का आरोप लगाया था। हालांकि, अदालत ने इन सभी पहलुओं के साथ-साथ पत्नी के सोशल मीडिया पर व्यवहार को तलाक का एक मुख्य आधार माना।
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि अगर कोई विवाहित महिला किसी दूसरे पुरुष के साथ आपत्तिजनक तस्वीरें क्लिक करवाकर उन्हें सोशल मीडिया पर साझा करती है, तो ऐसा आचरण पति के लिए अपमान और मानसिक पीड़ा का कारण बनता है। अदालत ने पाया कि इन पोस्ट्स से न केवल पति की गरिमा को ठेस पहुंची, बल्कि उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा भी धूमिल हुई। गवाहों के बयानों और एक दशक के संबंधों के साक्ष्यों का परीक्षण करने के बाद, अदालत इस निष्कर्ष पर पहुंची कि दंपति के बीच सुलह की तमाम कोशिशें नाकाम रही हैं और अब इस रिश्ते को सुधारा नहीं जा सकता।
फैसले में अदालत ने टिप्पणी की कि पति को उसके माता-पिता से अलग होने के लिए मजबूर करना, आपत्तिजनक ऑनलाइन पोस्ट के माध्यम से सार्वजनिक रूप से अपमानित करना और शत्रुतापूर्ण व्यवहार बनाए रखना गंभीर भावनात्मक संकट पैदा करता है। अदालत ने माना कि यह सब मानसिक क्रूरता के अंतर्गत आता है और विवाह पूरी तरह से टूट चुका है। इसके परिणामस्वरूप, कोर्ट ने पति की याचिका को स्वीकार करते हुए हिंदू विवाह अधिनियम के तहत उन्हें तलाक की डिक्री प्रदान की।